वो चाहता है अंगूठे बचे रहें सबके

-इंजी. एस डी ओझा

गोमती के तट पर स्थित उत्तर प्रदेश का जिला जौनपुर चमेली के तेल,तम्बाकू व इमरती के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है . जनश्रुति के अनुसार जौनपुर जमदग्नि ऋषि की तपस्थली थी . उनके नाम पर इस स्थान नाम जौनपुर पड़ा . कुछ का कहना था कि पहले इसका नाम यवनपुर था,जो बाद में अपभ्रंशित हो जौनपुर हो गया. सर्वमान्य तथ्य यह है कि जौनपुर की स्थापना 14 वीं शताब्दी में फिरोज तुगलक ने अपने चचेरे भाई सुल्तान मुहम्मद की याद में की थी. सुल्तान मुहम्मद को जौना खां भी कहते थे . जौना खां के नाम पर इसे जौनपुर कहा जाने लगा.

फिरोज तुगलक का खानदान शर्की कहलाया . शर्की शासकों का कार्य काल अंग्रेजों के शासन तक रहा . शर्की शासक कला प्रेमी थे. उनके काल में यहां कई मकबरे , मस्जिद और मदरसों का निर्माण हुआ. अटाला मस्जिद , जामी मस्जिद , शाही किला , लाल दरवाजा आदि स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं. यहां का शीतला माता मंदिर सबसे प्राचीन पौराणिक मंदिर है , जिसका समय समय पर जीर्णोद्धार होता रहा है. यह मंदिर बाहर से सामान्य मंदिर लगता है,पर अंदर जाकर भव्य दृश्य नजर आता है . इस मंदिर का विस्तृत क्षेत्र है . जौनपुर में बाबा बारीनाथ का मंदिर है ,जिसके पवित्र सरोवर में रोजना तीन से पांच हजार लोग स्नान करते हैं. यहां रामेश्वरम महादेव का भी मंदिर है.

प्रसिद्ध जगद्गुरु राम भद्राचार्य जौनपुर के हीं हैं. ये रामायण व महाभारत के एक अच्छे कथावाचक हैं. सन् 2015 में भारत सरकार ने इन्हें पद्म विभूषण सम्मान दिया था. डॉ. सरोज कुमार मिश्र ,पूर्व वैज्ञानिक ,नासा ,यू एस ए ; यहीं के हैं. जौनपुर मूली की खेती के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है . यहां की नेवार प्रजाति की मूली साढ़े तीन फीट तक लम्बी होती है. यहां की संस्कृति हिंदू मुस्लिम की मिली जुली संस्कृति रही है . ताजिया में हिंदू मुस्लिम दोनों भाग लेते हैं. एक साथ मिल जुलकर जीवन वशर करते हैं. यह क्षेत्र शिया बहुल क्षेत्र है . यहां फिरका परस्ती व नफरत के बीज बोने वालों को तरजीह नहीं दी जाती है. प्रसिद्ध गजलकार बादशाह राही ने लिखा है –

एक दो तीन होना बुरी बात है.
बीज नफरत के बोना बुरी बात है.

जौनपुर लिंगानुपात में पूरे प्रांत में अव्वल है . यहां प्रति 1000 पुरुषों में महिलाओं की संख्या 1018 है. लेकिन यहां की साक्षरता दर सबसे कम है . लगभग 30% लोग निरक्षर हैं ,जिनमें महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है. 30% अंगूठा छाप लोगों को शिक्षित करने के लिए उद्यमित प्रयास की जरुरत है. डॉ. वशिष्ठ अनूप के शब्दों में..

जो चाहेगा कि अंगूठे बचे रहें सबके,
वो कॉपियों की किताबों की बात करेगा .(इंजीनियर एस डी ओझा के फेसबुक वाल से साभार )

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