दिल्ली की दीवालीः रोशनी की छटा और पटाखोें की धूम

दिल्ली की दीवाली पर रौशनी की अद्भुत छटा और उसके साथ आतिशबाजी का संगम देखते ही बनता है। आज भी महंगाई के इस दौर में दिवाली की रात और उसके अगले दो दिनों तक दिल्ली—खासकर पुरानी दिल्ली में आतिशबाजी का नजारा देखने लायक होता हैं । हालांकि, अब दिल्ली की दीपावली पर भी आधुनिकता का रंग नजर आता है..इस पर और रौशनी डाल रहे हैं—फखरे आलम

दिल्ली की दीवाली के क्या कहने! तभी तो दिवाली से कई रोज पहले विदेशी सैलानी दिल्ली कूच करते हैं ताकि वे यहां दिवाली पर रौशनी की विहंगम छटा को करीब से निहार सकें। राजधानी दिल्ली दिवाली पर किसी दुल्हन से कम नजर नहीं आती। पटाखे और आतिशबाजी का जो दौर नवरात्र और दशहरा से शुरू होता है, वह दीपावली पर अपने चरम पर होता है। व्यापारिक प्रतिष्ठान हों या राजनीतिक गलियारे सब पर दीपावली की जगमगाहट का रंग झलकता है।

दरअसल, रामलीला और विजयादशमी के संपन्न हो जाने के साथ ही दिल्ली में दिवाली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। दीपावली का संबंध भी श्रीराम से जुड़ा है। इसलिए दिल्ली वाले इसे रामलीला का ही अगला अध्याय मानते हैं। राम ने लंकापति रावण पर विजय प्राप्त करके अयोध्या वापसी की और सिंहासन पर आसीन हुए। इस दिन दीयों से श्रीराम के आगमन का मार्ग रौशन किया गया, लिहाजा दिल्ली वाले भी अपनी दिल्ली को सजा देते हैं।
दिवाली के अवसर पर बेसन की पापडि़यां,मेवे,पेड़े,लड्डू और समोसे बनाने का रिवाज था दिल्ली में। हालांकि, समय की कमी और आधुनिकता ने आज बाजार निर्मित वस्तुओं और खाने—पीने की सामग्री पर आधारित जीवन बना दिया है। मगर फिर भी आज भी पुरानी दिल्ली के कुछ हिस्सों में अभी भी ऐसी परंपरा जीवित है।

घर के सभी सदस्यों के लिए नए कपड़े बनाने,नए बर्तन खरीदने, घर की साफ—सफाई, रंग—रोगन कराने का, दुकानों को सजाने, नए खाता बही आरंभ करने, लक्ष्मी और गणेश की संुदर और आकर्षक पQोटो खरीदने के साथ—साथ सजावट की वस्तुओं को खरीदने और घर लाने की परंपरा यहां आज भी है। दिल्ली के हलवाई खिलौनों के आकार में खांड और चीनी से मिश्रित मिठाइयां बड़े ही सुंदर और आकर्षक स्वरूप में बनाते हैं, जो आज भी दिल्ली की खासियतों में से एक है। इस विशेष अवसर पर घर में मेवे और फल लाने की परंपरा भी दिल्ली की दीवाली की खासियतों में से एक है।
मिट्टी के छोटे—छोटे दीयों की जगह आज भले ही आधुनिक बिजली की लडि़यों ने ले ली हो, मगर कतार मेें मिट्टी के छोटे—छोटे दीए रौशन करने की परंपरा आज भी पुरानी दिल्ली में कायम रही है। इतिहास पर नजर डालें तो आम नगरवासी दीए सरसों के तेल से जलाते थे, तो वहीं मोमबत्तियां अमीरों और रईसों के घरों की शान हुआ करती थीं। सभी मंदिरों और यहां तक कि यमुना तट पर भी दीए रौशन करने की दिल्ली में परंपरा रही है। एक दौर था, जब यहां यमुना किनारे जहां तक नजर जाती दिवाली के दिन दीयों की विहंगम पंक्तियां दिखाई देती थींं। लोग कहते थे इस दिन दिल्ली किसी जादूनगरी से कम नजर नहीं लगती थी। आज भी यमुना के तट पर दीए जलाए जाते हैं, हां इनकी संख्या जरूर कम हो गई है। यही हाल दिल्ली में लगने वाले पटरी बाजारों का हुआ है। दीवाली पर दिल्ली में पटरी पर बाजार खूब सजते थे।

जहां तक खाने—पीने की बात है, तो दीवाली के दिन दिल्ली के घरों में खिचड़ी—पूरी, खीर—पूरी और दही—बड़े बनते थे। रात्रि के समय लक्ष्मी—गणेश की तस्वीर पर पान का पत्ता और सुपारी के साथ चांदी के सिक्के अथवा सोने की अशर्फी को चिपका कर लक्ष्मी पूजा की जाती थी। इस अवसर पर घर के सभी सदस्य पूजा में सम्मिलित होते थे। घर की स्त्रियां नई—नई साडि़यों और गहनों का पूरा सेट पहन कर पूजा का सामान सजाती थीं। घर के जिस कमरे में पूजा का आयोजन किया जाता था,वहां रात भर तेल से भरा एक बड़ा दिया जलाया जाता था। रात भर लोग दरवाले खोलकर रखते थे और लक्ष्मी मां के आगमन की प्रतीक्षा होती थी। दिवाली की रात लोग छुप—छुप कर जुआ भी खेलते थे। वहीं लाल किला के भीतर भी दिवाली बड़े ही धूम—धाम से मनाई जाती थी। बादशाह इस दिन खूब सजते थे और लोगों में सोना—चांदी बांटा जाता था। रात में किला कंदीलों से रौशन होता था। यही नहीं किला परिसर में खेल—तमाशे भी आयोजित किए जाते थे, जिसमें सभी धर्मों के लोग बिना किसी भेदभाव के शामिल होते थे।
बदलते दौर के साथ दिल्ली की दिवाली की रौनक भी बदली है। सामाजिक बदलावों का असर अब इस त्यौहार पर भी नजर आता है, मगर आज भी दिवाली पर दिल्ली का अंदाज इसे किसी भी शहर से खास बना देता है। इसीलिए विदेशी सैलानी भी दिल्ली की दीपावली को नजदीक से देखने के लिए दिवाली से पहले ही यहां आना शुरू कर देते हैं।

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