“पहले लोकतंत्र को समझिये। फिर भारत को” – जनरल वीके सिंह

अब जब यह स्पष्ट हो गया है कि कृषि कानूनों के विरोध में जो लोग खड़े हैं उनका इस्तेमाल “Poetic Justice Foundation” जैसी संस्थाएँ कर रही हैं जो खालिस्तान के बारे में प्रचार करने वालों की खुली समर्थक हैं, एक क्षण रुक कर इसके दूरगामी परिणाम के बारे में सोचना आवश्यक है। PJF जैसी संस्थाएँ हरकत में कब आती हैं? जब उनके निशाने पर जो देश होता है उसमें कमज़ोरी के लक्षण दिखने शुरू हो जाएँ। भारत कृषि प्रधान देश है। कृषि से हर नागरिक का भावनात्मक जुड़ाव है। कहने की ज़रुरत नहीं है कि हमारे कुछ किसान, भ्रमित ही क्यों न हों, जब इस प्रकार विरोध पर बैठें तो हमारी भावनाओं को ठेस पहुँचती है। प्रधान मंत्री, कृषि मंत्री, केंद्रीय मंत्री मंडल, कृषि विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री एवं अंतर्राष्ट्रीय कृषि संस्थाओं ने इन कानूनों के बारे में फैलाई गयी भ्रांतियों के निवारण के लिए आगे बढ़ कर अपना पक्ष रखा है। किसानों से खुले मन से बातचीत की गयी है। हर बिंदु पर चर्चा के लिए आमंत्रण दिया गया है। यहाँ तक कि यह पेशकश भी दी गयी कि डेढ़ साल तक कानूनों को लागू नहीं किया जायेगा। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश भी मान्य नहीं समझे इन्होने। यह सभी को पता है कि विरोध पर बैठे किसान देश के हर किसान का प्रतिनिधित्व नहीं करते। फिर भी आशा थी कि बातचीत के माध्यम से यह टकराव सुलझ जायेगा। लोकतंत्र में ऐसा ही होता है। परन्तु निश्चित रूप से देश के आंतरिक व बाहरी शत्रु लोकतंत्र में चल रही इस प्रक्रिया में अपना लाभ भुनाने से बाज नहीं आते।

सूत्रों से मिली जानकारी की मानें तो PJF जैसी संस्थाएँ इस विरोध की आड़ में अपने ना’पाक’ मंसूबों में जान फूँक रहे हैं। दोनों हाथों से धन लुटा कर ऐसे प्रभावशाली लोगों से भारतीय कृषकों के लिए समर्थन खरीद रहे हैं जिन्हें कृषि मसलों का लेशमात्र ज्ञान भी नहीं। और समर्थन जुटा कर बीच में खालिस्तान की मांग को फुसफुसा देते हैं। अब ऐसे वीडियो भी सामने आ गए जहाँ ये डंके की चोट पर कह रहे हैं कि यदि कृषि कानून वापस भी ले लिए जाएँ, तब भी आंदोलन चलता रहेगा जब तक खालिस्तान नहीं बन जाता। मैं पूछता हूँ कौन सा खालिस्तान भाई? विभाजन के पूर्व पंजाब का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज के पाकिस्तान में है। कनाडा समेत कई देशों में सिखों की बहुत बड़ी संख्या है। तो खालिस्तान की सीमाएँ क्या होंगी? शायद आतंक के उस उत्पादक देश से पूछना सही रहेगा जहाँ इस ना’पाक’ आंदोलन का सृजन हुआ था। धर्म के आधार पर विभाजन का परिणाम हम देख ही चुके हैं। पंजाब में जाइये। वहाँ के लोगों से बात करिये जिन्होंने इस आंदोलन में अपनी बहु-बेटियाँ, पिता-पुत्र-भाई खोये हैं। उन्हें आतंकवाद से एक साधारण भारतीय के मुकाबले कहीं अधिक घृणा है। सिख समुदाय भारत का एक अत्यंत आदरणीय समुदाय है। जिन्होंने धर्म और अपने हमवतनों के लिए मुग़लों से लोहा लिया, अपने बेटों के शीश कटवा लिए और ऐसे पंथ की स्थापना की जो विश्व भर में सेवा और सद्भाव का पर्याय बन गया, क्या वे कभी खालिस्तान जैसी ना’पाक’ मांग का समर्थन कर सकते हैं? मानिये या न मानिये, इस विरोध का दुरूपयोग होना शुरू हो चुका है। और यह लज्जास्पद है, और हमेशा रहेगा। गुरु साहिबान की शिक्षा हमें यह नहीं सिखाती।

जिस देश में PJF का वह सदस्य लोगों को उकसा रहा था, उसी देश के कई परिवारों ने 1985 में विमान धमाके में अपनों को खोया था जब खालिस्तान आंदोलन के आतंकियों ने एयर इंडिया के विमान को धमाके में उड़ा दिया था। इनको समझ में नहीं आता, मगर तेज़ाब सबसे अधिक उस शीशी को ही नुक्सान पहुँचाता है जिसमे उसे रखा जाता है। इन्हीं लोगों के कारण पंजाब में आतंकवाद फैला था जिसने असंख्य परिवारों को तबाह कर दिया।

मैं यहाँ विरोध में बैठे किसान संगठनों के नेताओं से कहना चाहूंगा की शायद अभी आप को PJF सुविधाजनक लग रहा है। बाद में आप की पहचान उन लोगों के रूप में होगी जिन्होंने हमारे महान लोकतंत्र में सेंध लगवा दी क्योंकि उस समय कुछ विदेशियों के ट्वीट और प्रचार आपके समर्थन में आ गए। रट्टू तोते की तरह जो बिकाऊ लोग, जिन्हें इन मसलों की समझ नहीं है, वे अपने फ़ोन से एक वाक्य लिख रहे हैं, और इसका फायदा वह उठा रहे हैं जो हमारे देश को कमज़ोर देखने का जुनून पाले हुए हैं। ऐसे लोग स्वयं के स्वार्थ में काम कर रहे हैं, न कि किसान या देश के हित में।

परन्तु जो ताकतें भारत के लोकतंत्र और उसकी शक्ति को हलके में ले रहीं हैं उन्हें मैं एक सन्देश देना चाहूंगा। पहले लोकतंत्र को समझिये। फिर भारत को। जिस चाय और योग को आप बदनाम करना चाहते हैं, वे विश्व भर के लोग अपने दिल में बसाये हुए हैं। वे बिकाऊ नहीं हैं। किसी भी स्तर की साजिश और धन से यह प्रेम और आदर नहीं मिट सकता जो भारत ने अपने सद्कर्मों से कमाया है। हमारे देश में कुछ दीमक जैसे लोग हैं जो तब खुश होते हैं जब भारत का सर झुकता है। वे हारेंगे। लोग उन्हें पहचानते हैं। भारत एक है। हमेशा रहेगा। आइये हम सब अपने अपने तरीके अपनी अपनी क्षमता से, अपने विवेक से इन्हे निष्कृय करें।

जय हिन्द।

जनरल वीके सिंह के फेसबुक पेज से!

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