राम के नाम पर डीयू में किसे डर लगता है ?

दशहरा का समय नहीं है मगर दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में मर्यादा पुरुषोत्‍तम श्रीराम इन दिनों खूब चर्चा में हैं। 9 और 10 जनवरी को डीयू के नॉर्थ कैंपस स्थित कांफ्रेंस सेंटर में भारतीय धर्म एवं संस्‍कृति-श्रीराम मंदिर विषय पर एक सेमिनार आयो‍जित किया जा रहा है, जिसे रुकवाने की हर संभव कोशिशों में जुटे हैं डीयू के वाम संगठन। उनकी सक्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 8 जनवरी को डीयू के फैकल्‍टी ऑफ आर्ट्स के सामने इन संगठनों ने संयुक्‍त रुप से एक जनसभा की और ऐसे आयोजन को विश्‍वविद्यालय में सांप्रदायिक सौहाद्र को गंभीर आघात पहुंचाने वाला बताया। दरअसल, सवाल यह नहीं है कि गंभीर मुद्दों पर विश्‍वविद्यालय समुदाय के बीच बहस, चर्चा, परिचर्चा, सेमिनार आदि होने चाहिएं या नहीं, बल्कि प्रश्‍न यह है कि हिंदुस्‍तान में राम के नाम पर यदि कोई तथ्‍यपरक आयोजन होता है तो बजाय परिप्रेक्ष्‍य को समझे क‍थित सांप्रदायिकता के नाम पर उसका मुखर विरोध करना सही है?

वैसे, यह सीमित वैचारिक विरोध सामान्‍य स्‍तर तक रहे तो ठीक, लेकिन यदि यह सीमारेखा को पार करने लग जाए, तो ऐसा लगने लगता है कि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता मानो भारतीय संविधान ने वापस ले ली हो। राम के नाम पर देश के अग्रणि केंद्रीय विश्‍वविद्यालय-डीयू में श्रीराम मंदिर जैसे मुद्दे पर चर्चा-परिचर्चा को होने से ही रोकने के भगीरथ प्रयासों में कोई कमी न छोड़ी जाए, तो इसे अभिव्‍यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाए जाने के प्रयास के अलावा और क्‍या कहा जाएगा?

उल्‍लेखनीय है कि 9 और 10 जनवरी को प्रस्‍तावित परिचर्चा में 9 जनवरी को भाजपा नेता और आयोजक संस्‍था के अध्‍यक्ष डॉ-सुब्रह्रणियम स्‍वामी प्रमुख वक्‍ता हैं। इसके साथ ही दो दिवसीय इस परिचर्चा में इतिहास और अन्‍य क्षेत्रों के विद्वान विशेषज्ञ एक मंच पर अपने विचार साझा करेंगे। विश्‍वविद्यालय परिसर में इसके आयोजन से ठीक एक दिन या यूं कहें कि कुछ ही घंटे पूर्व नॉर्थ कैंपस में वामपंथी संगठनों ने संयुक्‍त रुप से ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की मानो, इस दो दिवसीय परिचर्चा के आयोजन से दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में सांप्रदायिक सौहाद्र जैसे छिन्‍न-भिन्‍न हो जाएगा और शैक्षणिक माहौल कथित रुप से सांप्रदायिक शक्तियों के रंग में रंगने का खतरा और गहरा जाएगा। उल्‍लेखनीय है कि शुक्रवार की जनसभा में वामपंथी संगठनों ने मंच से अपने भाषणों और पोस्‍टरों के माध्‍यम से भाजपा पर भरपूर निशाना साधा।

डीयू के फैकल्‍टी ऑफ आर्ट्स के सामने जनसभा

दरअसल, विश्‍वविद्यालय के सूत्र यह बताते हैं कि वामपंथी संगठनों ने इस परिचर्चा को रुकवाने की भरसक कोशिशें कीं। इन संगठनों ने विश्‍वविद्यालय प्रशासन पर जबर्दस्‍त दबाव बनाया। डीयू में 4 जनवरी, जब से सेमेस्‍टर ब्रेक के बाद विश्‍वविद्यालय खुला, इसके आयोजन से जुड़े लोगों खासकर कांफ्रेंस सेंटर की बुकिंग करवाने और बुकिंग फार्म पर अपनी रिकमेंडेशन देने वाले एक विभागाध्‍यक्ष को बुलाकर जमकर सुनाया गया। हालांकि, हेड ने जब यह कहा कि वे चाहें तो आयोजन की बुकिंग रद्द कर सकते हैं। मगर दबाव में आया विश्‍वविद्यालय प्रशासन इस दुविधा में रहा कि आयोजन की अनुमति जारी रहने दिया जाए या फि‍र टॉपिक बदलने के मुद्दे को आधार बनाते हुए किसी तरह इस आयोजन को न होने दिया जाए। व़हीं, कई दिनों की उहापोह के बावजूद विश्‍वविद्यालय प्रशासन के कुछ अधिकारी खुल कर किसी भी निर्णय पर पहुंचते नजर नहीं आएं। इसका कारण यह रहा कि दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय को उसका नया वाइस चांसलर किसी भी समय मिल सकता है। दूसरा, चूंकि राम जन्‍मभूमि का मुद्दा राष्‍ट्रीय महत्‍व रखता है। ऐसे में इसे रद्द करने का नकारात्‍मक संदेश जनमानस में जाएगा और संभव है कि नए वाइस चांसलर के आने के बाद आयोजन पर रोक लगाने वाले अधिकारियों पर गाज गिरे। डीयू के सूत्र बताते हैं कि इसी के चलते डीयू को राम के नाम पर होने वाले इस आयोजन को न चाहते हुए भी स्‍वीकार करने पड़ा।

बहरहाल, जो भी हो लेकिन राम के नाम पर डीयू में पिछले दिनों जो रार हुई उसने एक बात तो जरुर साफ कर दी कि डीयू में वामपंथी राजनीति चर्चा के केंद्र में बने रहने के लिए मुद्दों की तलाश कर उनके माध्‍यम से सरकार पर हमला बोलने का कोई भी अवसर हाथ से गंवाना नहीं चाहती। चाहे नॉन नेट फेलोशिप के नाम पर यूजीसी पर धरना हो या फि‍र एफटीटीआई के प्रमुख के रुप में अभिनेता गजेंद्र चौहान की नियुक्ति का जोरदार विरोध।
दरअसल, राजनीति के जानकारों की राय में राम का नाम वामपंथी राजनीति पर करारा चोट करता है। क्‍योंकि यह नाम भारत को एक राष्‍ट्र में जोड़ने का सबसे बड़ा प्रतीक है। राम के नाम पर समूचा देश एक सूत्र में पिरो उठता है। उसका यही डर वामपंथी राजनीति में खलबली मचाए हुए है। राजनीति के जानकारों की राय में धर्म के नाम पर जाति गौण हो जाती है। ऐसे में यदि राम के नाम पर राष्‍ट्र में एकजुटता की भावना का संचार होता है तो फि‍र राष्‍ट्रीयता की यह भावना वामपंथी राजनीति को हाशिए पर धकेलने का काम कर सकती है।

हालांकि, छात्रों की राय है कि किसी भी क्रांतिकारी बदलाव में विद्यार्थियों की भूमिका सर्वोपरि होती है। ऐसे में डीयू में जहां से निकला संदेश देश की राजनीति पर व्‍यापक असर डालता है। वहां, वैचारिक आंदोलन की मजबूरियों को दरकिनार करते हुए गंभीर मुद्दों पर चर्चा-परिचर्चा होनी ही चाहिए क्‍योंकि अक्‍सर इससे बड़े-बड़े समाधान चुटकियों में निकल आते हैं।

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