टूटता विखरता परिवार, कौन जिम्मेवार?

-इंजी.एस.डी.ओझा

पहले संयुक्त परिवार का कांसेप्ट था. मनोविश्लेषकों के अनुसार जिस तेजी से लोग शिक्षित हुए हैं उतनी हीं तेजी से उनकी मानसिक स्थिति में भी बदलाव आया है.पहले एक आदमी कमाता था, दस बैठकर खाते थे. अब सभी को कमाना पड़ता है. नतीजा एकल परिवार का चलन हो गया. एकल परिवार में होने लगे हैं पति पत्नी और बच्चे. चाचा चाची, ताऊ व ताई को अलग कर दिया गया. इस एकल परिवार में मां बाप पेण्डुलम की तरह हो गये. कभी किसी बेटे बहू के साथ तो कभी किसी और बेटे बहू के साथ. एकल परिवार और भी विघटित होने लगा है. बाज दफा पति पत्नी भी एक दुसरे से अलग रहने लगे हैं . पति पत्नी के बीच अब बच्चे पेन्डुलम बन गए हैं.

ये एकल परिवार हीं आज परिवार के बिखराव के जिम्मेवार हैं. पहले पति पत्नी में तनाव, मनमुटाव होता था तो संयुक्त परिवार ऐसा करने से रोकता था. घर के बड़े बुजुर्ग हस्तक्षेप करते थे, समझाते थे. परिवार टूटने से बच जाता था. अब बड़े बुजुर्ग हीं हाशिए पर चले गये हैं. उनके प्रति मान सम्मान में कमी कर दी गई है. बुजुर्ग ऐसे मामले में अब दूर हीं रहते हैं. आज की बहुएं अपने कर्तब्य के प्रति समर्पित न हो अपने अधिकार के प्रति सचेत हो गईं हैं. कुछ पति भी अपने सत्तात्मक प्रवृति के वशीभूत हो पत्नियों पर जुल्म ढाने से बाज नहीं आ रहे हैं. बहुएं सदियों से चली आ रही पितृ सत्ता के विरोध में उठ खड़ी हुई हैं.

परिवार के बिखराव में मोबाइल का भी अहम् रोल है. सास ने एक की बजाय दो टमाटर का तड़का लगाने पर डांटा तो मोबाइल के मार्फत् यह खबर नमक मिर्च के साथ अविलम्ब बहू के मायके पहुंच जाती है.फिर शुरू हो जाता है, मोबाइल पर दोनों समधन का बातचीत का अनवरत सिलसिला ,जो अनुनय विनय से शुरू हो आरोप प्रत्यारोप के चरम बिन्दु पर खत्म होता है. पंजाब का महिला आयोग परिवार के विखराव के लिए मोबाइल को एक बहुत बड़ा कारण मानता है.

पहले पिता बेटी की विदाई के समय यह सीख देता था, “बेटी, इस घर से तुम्हारी डोली उठी है, उस घर से अर्थी उठेगी. ” हमारे एक जानने वाले ,जो काफी दबंग थे, बेटी द्वारा फोन पर शिकायत करने पर यही सीख देते थे, “बेटी, किसी तरह से एडजस्ट करने की कोशिश करो. ” वे दबंग थे. आनन फानन में बेटी की ससुराल पहुंच उनकी ऐसी तैसी कर सकते थे, परन्तु उनका कहना था कि यह कृत्य समस्या का समाधान नहीं है. बेटी को उसी घर में रहना है. दबाव से वह अपने ससुराल वालों का दिल नहीं जीत सकती. दामाद भी बेटी से खुश नहीं रहेगा. पिता की सीख मान बेटी ने एडजस्ट करना शुरू किया. धीरे धीरे परिस्थितियां अनुकूल हो गईं . आज बेटी उनकी सुखी व सान्नद है.

शुरूआती दौर बहू के लिए दो परिवारों के अलग अलग रीति रिवाजों के बीच सामंजस्य बिठाने का होता है.
यदि बहू इसमें सफल हो गई तो बल्ले बल्ले नहीं तो अल्लाह ही बेली (खुदा हीं मालिक) है. औरतों का स्वभाव पानी की तरह होता है. पानी का कोई अपना आकार नहीं होता है. इसे गिलास, बाल्टी, लोटा या जिस भी बर्तन में रखा जाए यह उसी का आकार अख्तियार कर लेता है. औरत भी परिस्थिति के अनुसार अपने को ढाल लेती है. वह अपने घर के जाने पहचाने माहौल से निकल अनचिन्हें ,अबूझे ससुराल को अपना घर बना लेती है तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. पुरुषों में इस कला का अभाव है. इसीलिए बहुत कम पुरूष घर जमाई बन पाते हैं.

आज जो परिवार विखर रहा है, उसका मूल कारण बेटी के घर वालों का अनावश्यक बेटी की जाति जिन्दगी में दखल है. क्या बनाया, क्या खाया, क्यों बनाया, क्यों खाया? आदि अनावश्यक प्रश्न पूछे जाएंगे तो इससे परिवार टूटेगा, जुड़ेगा नहीं. कई महिलाएं अपनी ससुराल छोड़ माएके में रह रहीं हैं. उनके माएके वाले ईगो पाले हुए हैं. लड़कों वालों से न बात करते हैं और न तालाक की अर्जी देते हैं. लड़की उस घड़ी को कोस रही होती है, जब उसने घर छोड़ा था. आस पड़ोस के लोग पूछते हैं, कब जाओगी? सांप छंछूदर वाली असमंजस की स्थिति बन जाती है. लड़की पति द्वारा दिए जाने वाले भरण पोषण भत्ते से भी मरहूम हो अपने मां बाप पर बोझ बन के रह जाती है.

न खुदा हीं मिला,
न बिसाल-ए-सनम.
ना इधर के रहे हम,
ना उधर के रहे हम .

जिन परिवारों में एकमात्र संतान बेटी हो, उन परिवारों में बेटी की परेशानी की जरा सी भनक मिलते हीं मां बाप बेटी का घर उजाड़ने के लिए सक्रिय हो जाते हैं. वे बेटी को अपने घर पूरे दम खम से लाते हैं. बेटी को यह विश्वास दिलाते हैं कि वे उसे सर अांखों पर बिठा कर रखेंगे. उसकी हर जरूरत पूरी करेंगे. इस तरह से उन्हें नाती पोते मिल जाते हैं. उनकी मन की बगिया झूम उठती है, पर बेटी का घर उजड़ जाता है.

तालाक और डायवोर्स शब्द उर्दू व अंग्रेजी के शब्द हैं, पर हिन्दी में इसका कोई समनार्थक शब्द नहीं है. इसलिए उर्दू के तालाक से हीं हिन्दी वालों को भी काम चलाना पड़ रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि हमारे ऋषि मनीषियों ने तालाक की परिकल्पना हीं नहीं की थी .अाज भी भारत में तालाक दर सिर्फ 1.1% है, जो आज से 60 साल पहले भी था. कारण, यहां तालाक के नियम बड़े सख्त हैं. विदेशों में छोटी छोटी बातों पर भी तालाक हो जाया करते हैं. यहां परिवार नाम की ईकाई जो अब भी तालाक के खिलाफ तलवार भांजती है. ऐसे में तो तालाक दर 1.1% हीं रहेगा न ?

पति पत्नी को यह मानकर चलना चाहिए कि खुशी बांटने वाले हजारों मिल जाएंगे, दुःख पर आंसू बहाने वाले गिने चुने हीं होंगे. पति पत्नी की तथाकथित अक्लमंदी एक दुसरे के सामने झुकने नहीं देती. जब अक्लमंदी होश में आती है तो समय निकल चुका होता है. समय का रेत कभी भी मुट्ठी में बंद नहीं किया जा सकता. पति पत्नी की नाराजगी सबसे पहले एक दुसरे को कष्ट पहुंचाती है. दुनियाँ में कोई भी शत प्रतिशत अच्छा नहीं है. यह मान कर चलेंगे तो जीवन सुखी होगा. गालिब ने भी यही कहा था –

“गालिब ” बुरा न मान जो वाइज बुरा कहे,
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे.
(फेसबुक वॉल से साभार)

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