फिर वही हवा मिठाई !

-ध्रुव गुप्त

गांवों और छोटे कस्बों से जुड़े मित्रों को हवा मिठाई की याद तो ज़रुर होगी। इसे गुड़िया या बुढ़िया के बाल भी बोलते हैं ! रुई के मुलायम गुलाबी, हरे, सफ़ेद फाहों जैसी गोल-गोल या लंबी-लंबी मिठाई। हवा से भी हल्की। चीनी से भी ज्यादा मीठी। मुंह में रखते ही हवा की तरह उड़ जाने वाली यह मिठाई जुबान पर एक तीखी, किरकिरी-सी मिठास छोड़ जाती है। सिर्फ कुछ पलों के लिए और फिर किस्सा ख़त्म ! मुंह में घुलने के साथ ही ठगे जाने का एक अहसास। स्वाद कुछ ऐसा कि बार-बार ठगे जाने के बाद भी बार-बार जुबान पर रखने को जी चाहे। तब एक पैसे के भाव से बिकने वाली छलना-सी इस मिठाई के प्रति दीवानगी का आलम ऐसा था कि बात मां के गुल्लक या पिता की ज़ेब से पैसे चुराने तक पहुंच जाया करती थी। बहुत ज़माने बाद आज एक ग्रामीण बाज़ार में इसे बिकते देखा तो डायबिटिक होने के बावज़ूद खाने का लोभ नहीं रोक पाया। एक साथ चार-पांच उड़ा लिया।

एक बार फिर वही मिठास। एक बार फिर वही धोखा। इस बार भी ससुरी जुबान पर रखते ही उड़ गई !(फेसबुक वॉल से साभार)

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