भूकंप को लेकर छोड़नी होगी बेफिक्री

उस खौफनाक शनिवार की यादें भला कौन भूल सकता है, जब, नेपाल और भारत के कई राज्यों विशेषकर बिहार में आए भयानक भूकंप से पूरी दुनिया हिल उठी। डर से लोग अपने घरों को जाने की बजाए खुले आसमान के नीचे रात गुजारते दिखे। मानो, कब फिर से भूकंप का झटका आकर हजारों जिंदगियों को सदमा पहुंचा जाए!

हाल के इस सबसे बड़े भूकंप से सबसे ज्यादा तबाही नेपाल में हुई है। नेपाल की वर्षों पुरानी पहचान धरहरा टावर भी देखते ही देखते धराशायी हो गया। इसमें कोई शक नहीं कि पड़ोसी देश होने के नाते भारत वहां तत्परता से राहत एवं बचाव कार्य में जुटा हुआ है। हालांकि, इस संपादकीय के लिखे जाने तक बचाव अभियान अभी तक काठमांडू और आसपास के इलाकों तक ही सीमित था। छोटे शहरों और गांवों का, जहां सबसे ज्यादा तबाही हुई है, अभी पूरी तरह बचाव कार्य नहीं हो पाया था, राहत तो बहुत दूर की बात है। भारत और दुनिया के अन्य देशों से आए सहायता दल राहत सामग्री को लोगों को पहुंचा रहे हैं, कोशिश यही हो रही है कि जहां तक संभव हो सके, मलबे में दबे पंQसे लोगों को बाहर निकाला जा सके।

दरअसल, दुनिया भर के भूगर्भ विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल में आए जबर्दस्त भूकंप से हालात इतने ज्यादा इसलिए बिगड़े हैं, क्योंकि अन्य विकासशील देशों की तरह वहां भी आपदा, पूर्व प्रबंधन पर कुछ खास काम नहीं हुआ है। सच तो यह है कि नेपाल ही नहीं भारत जैसे देश में भी आपदा प्रबंधन के नाम पर केवल खानापूरी ही होती देखी गई है। केदारनाथ की तबाही के मंजर अभी भी आंखों के सामने घूम रहे हैं। ऐसे में नेपाल की इस भारी तबाही से भारत को भी सबक लेने की जरूरत है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश के 38 शहर भूकंप के लिहाज से ट्टहाई रिस्क जोन में आते हैं। अहमदाबाद स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ सीस्मोलॉजिकल रिसर्च के विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड के नीचे भूकंपीय खाइयां मौजूद हैं, जिनके चलते यहां अगले 50 वर्षों के अंदर कभी भी नेपाल जैसा भूकंप आकर जान माल को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। जाहिर है, ऐसे में हमें बड़े स्तर पर एहतियाती उपाय करने होंगे। हालांकि वर्ष 2001 में गुजरात में आए भूकंप के बाद देश में इस मामले को लेकर जागरूकता कुछ हद तक बढ़ी है, मगर अफसोस की बात यह है कि हम इसे भयंकर चेतावनी के रूप में लेते हुए चेत नहीं रहे हैं। उल्लेखनीय है कि महानगरों तक में बन रही इमारतों को पूरी तरह भूकंप रोधी नहीं कहा जा सकता। दिल्ली जो कि देश की राजधानी है, यहां भी 80 प्रतिशत मकान सुरक्षित नहीं बताए गए हैं। एनसीआर में बने अपार्टमेंट बहुत हद तक भूकंप रोधी होने का दावा तो करते हैं, मगर उनके दावे पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। नई मल्टीस्टोरी रिहायशी कॉलोनियां भूकंप जैसी आपदा से निपटने के सारे एहतियाती उपाय किए जानें का जोर शोर से प्रचार भले ही करें, मगर सच यह भी है कि कई जगहों पर बिल्डिंग कोड का पालन नहीं होता, खासकर निजी निर्माण में। ऐसा उन जगहों पर भी हो रहा है, जो भूकंप के हिसाब से संवेदनशील मानी जाती हैं।

उल्लेखनीय है कि सन् 2005 में डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट बना। आज हमारे पास एनडीआरएफ (राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल) की एक मजबूत टीम है, जो पड़ोसी देशों तक को मदद पहुंचाने में सक्षम है। पर भूकंप को लेकर कोई राष्ट्रीय योजना अभी तक हमारे पास नहीं है। वर्ष 2013 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में इसके लिए सरकार की आलोचना भी की गई थी।

नेपाल में हाल की त्रासदी जहां दुनिया को भूकंप के खतरे से निपटने के लिए सचेत कर रही है, वहीं भारत को इसे बहुत ही सीरीयसली लेना होगा। समय आ गया है कि भूकंप को लेकर एक वृहद् राष्ट्रीय योजना पर काम किया जाए। जन जागरूकता पैदा की जाए। इसके लिए स्कूल स्तर से कार्यव्रQम शामिल करने होंगे, क्योंकि आपदा के समय छोटे छोटे बच्चे इसका अधिक शिकार होते देखे गए हैं। इसलिए बच्चों को खेल-खेल में जागरूक करना इसका एक अहम हिस्सा होना चाहिए।

जहां तक आपदा प्रबंधन के तरीकों की बात है, तो लोगों में अब भी भूकंप को लेकर कई तरह की गलतफहमियां हैं। बचाव के उनके तरीके गलत हैं। जैसे पिछले ही दिनों भूचाल आने पर लोग अपनी बिल्डिंगों से निकलकर उनके आसपास खड़े हो गए, जबकि ऐसा करना बेहद खतरनाक है। ऐसे में हमें जरूरत इस बात की है कि जापान की तर्ज पर हमारे देश में भी लोगों को भूकंप से बचाव एवं प्रबंधन के तौर-तरीकों के बारे में कागजी खानापूरी नहीं बल्कि पूरी तरह से व्यावहारिक शिक्षा दी जाए। जरूरत इस बात की भी है कि स्कूल स्तर से लेकर विश्वविघालय स्तर तक आपदा प्रबंधन पाठ्यक्रंम का जरूरी हिस्सा होना चाहिए।

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